Dr.raghav nath Jha 7 months ago
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जैसा अन्न, वैसा मन : आज के सामाजिक संकट का मौन कारण

भारतीय समाज में अन्न को केवल जीवन-निर्वाह का साधन नहीं, बल्कि मन, विचार और चरित्र का मूल आधार माना गया है। प्राचीन लोकोक्ति— “जैसा खाए अन्न, वैसा होय मन”— इसी जीवन-दृष्टि की संक्षिप्त लेकिन गहन अभिव्यक्ति है। यह कहावत आज के सामाजिक परिदृश्य में पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है। हमारी परंपरा में यह स्पष्ट मान्यता रही कि अन्न की शुद्धता केवल उसके स्वाद या पोषण से नहीं, बल्कि उसके अर्जन की प्रक्रिया और उसे ग्रहण करने की मानसिक अवस्था से तय होती है। इसलिए श्रम से अर्जित आजीविका, संयमित जीवन और शांत भाव से भोजन—ये केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन के आधार थे। परंतु आज का यथार्थ इससे भिन्न है। आज हम ऐसे समय में हैं जहाँ तेज़ सफलता, त्वरित लाभ और शॉर्टकट को सामान्य समझा जाने लगा है। ईमानदार श्रम की जगह चालाकी को, और धैर्य की जगह आक्रामकता को व्यवहारिक बुद्धिमत्ता मान लिया गया है। इसका सीधा असर समाज के व्यवहार, भाषा और संवेदनशीलता पर दिख रहा है। हम देखते हैं कि— सार्वजनिक जीवन में असहिष्णुता बढ़ रही है, सामाजिक संवाद में कटुता सामान्य होती जा रही है, युवाओं में अधैर्य, असंतोष और हिंसक प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। इन समस्याओं को प्रायः केवल प्रशासनिक या आर्थिक दृष्टि से देखा जाता है, जबकि इनके पीछे मूल्यबोध के क्षरण की भूमिका को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। यह समझना आवश्यक है कि जब अन्न— अन्याय, भ्रष्टाचार या अनैतिक साधनों से अर्जित धन से आता है, और तनाव, क्रोध या उपेक्षा की अवस्था में ग्रहण किया जाता है, तो उसका प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। वह धीरे-धीरे समाज की सामूहिक चेतना को प्रभावित करता है। यही कारण है कि कानून, योजनाएँ और शिक्षा होने के बावजूद सामाजिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता और विकास की दौड़ में अपनी सांस्कृतिक चेतना को पूरी तरह न खो दें। समाधान केवल नीतियों और घोषणाओं में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आचरण और सामाजिक मूल्यों की पुनर्स्थापना में है। ईमानदार आजीविका, संयमित उपभोग और सजग जीवन—ये विचार भले ही पुराने लगें, पर आज के सामाजिक संकटों के लिए यही सबसे आधुनिक उत्तर हैं। यदि हमें सचमुच एक शांत, सहिष्णु और संतुलित समाज चाहिए, तो हमें फिर से इस मूल सत्य पर विचार करना होगा— जैसा अन्न होगा, वैसा मन बनेगा; और जैसा मन बनेगा, वैसा ही समाज। यह केवल आध्यात्मिक चिंतन नहीं, बल्कि आज के सामाजिक यथार्थ की एक गंभीर चेतावनी है।


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